किसको मैं भगवान कहूँ ?
तुम्हें
जो मंदिर में चुपचाप बैठा हो !
या उसे
जो सड़कों पर चल -चल कर,
अपने जूते घिस रहा है,
और तलुओं के छाले निकल आए हैं ?
किसको मैं भगवान कहूँ ?
तुम्हें ?
या उसे ?
जो धूप में भी तरतर हो जाता है ?
सहायता की किसको ज़रूरत है ?
तुम्हें ?
तूफ़ान में भी , जिसका बाल बाँका नहीं होता ?
या उसे ?
हल्की हवा में,जिसके सर से छ्प्पर उड़ जाती है
(मारीशस के अप्रवासी भारतीय कवि राज हीरामन के
कविता संग्रह …एक ज़मीन आसमान पर से साभार)
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1 comment:
बहुत उम्दा प्रस्तुति. आभार.
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