Monday, April 21, 2008

हे धरती; माँ हम तुम्हारी आराधना करते हुए अपनी यात्रा प्रारंभ करते हैं

विश्वस्वं मातमोष धीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृतम ।
शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा ।।
अर्थात
जीवन के लिये
पर्यावरण को साधती
लाभकारी स्थायित्व देती
औषध वनस्पति धात्री
ओ धरती
सब करें सेवा तुम्हारी.


-अथर्व वेद के पृथिवी सूक्त से

3 comments:

गुस्ताखी माफ said...

इस यात्रा पर आपका स्वागत है
लेकिन आप इस वर्ड वेरीफिकेशन को हटाईये. एकदम बैरी लगता है

सरोकार पर्यावरण से said...

गुस्ताख़ी माफ़...हटा दिया हुज़ूर.
आते रहियेगा ज़रूर.

एक पंक्ति said...

निसर्ग की खै़रियत का ये कारवाँ कामयाब हो..दुआएँ हमारी....ढेर सारी.