Friday, May 9, 2008

- वृक्ष प्रेम पर कविवर नरेश सक्सैना की भावपूर्ण कविता

एक वृक्ष भी बचा रहे....

अंतिम समय जब कोई नहीं जाएगा साथ
एक वृक्ष जाएगा
अपनी गौरयों -गिलहरियों से बिछुड़ कर
साथ जाएगा एक वृक्ष
अग्नि में प्रवेश करेगा वह मुझसे पहले

कितनी लकड़ियाँ लगेगी ?
श्मशान की टाल वाला पूछेगा
ग़रीब से ग़रीब भी सात मन तो लेता ही है !

लिखता हूँ अंतिम इच्छाओं में....
बिजली के दाह घर में
हो मेरा संस्कार
ताकि मेरे बाद
एक बेटे और एक बेटी के साथ
एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में।


- नरेश सक्सैना.

Thursday, May 1, 2008

किसको मैं भगवान कहूँ ? उसे; जिसके तलुओं से छाले निकल आए हैं !

किसको मैं भगवान कहूँ ?
तुम्हें
जो मंदिर में चुपचाप बैठा हो !
या उसे
जो सड़कों पर चल -चल कर,
अपने जूते घिस रहा है,
और तलुओं के छाले निकल आए हैं ?
किसको मैं भगवान कहूँ ?
तुम्हें ?
या उसे ?
जो धूप में भी तरतर हो जाता है ?
सहायता की किसको ज़रूरत है ?
तुम्हें ?
तूफ़ान में भी , जिसका बाल बाँका नहीं होता ?
या उसे ?
हल्की हवा में,जिसके सर से छ्प्पर उड़ जाती है


(मारीशस के अप्रवासी भारतीय कवि राज हीरामन के
कविता संग्रह …एक ज़मीन आसमान पर से साभार)

Monday, April 28, 2008

देवेन्द्र की कूँची से फूल खिला है !


जी दोस्तो ……ये ख़ुशख़बर आपको देते हुए असीम प्रसन्नता है
कि नि:सर्ग को प्रतिबद्ध इस चिट्ठे पर अब देश के सुविख्यात
कार्टूनिस्ट श्री देवेन्द्र नज़र आएंगे। आजकल देवेन्द्रजी की कूँची का
जादू अहा!ज़िन्दगी में सर चढ़ कर बोल रहा है…तक़रीबन हर माह
देवेन्द्र के करिश्मे को आप यहाँ देख सकते हैं।

Saturday, April 26, 2008

कहने से कुछ नहीं होगा.....बचाना ही पडे़गा...पानी

पानी को लेकर गुज़रे ज़माने में एक विशेष तरह की निश्विंतता हुआ करती थी।वजह यह थी कि पानी वापरने वाले,पानी को सहेजने के मामले में या अप्ने आसपास के तालाबों, कुंओं,और झीलों की सुध लेने के मामले में वैसा ही सरोकार रखते थे जैसा कि जीवन के अन्य क्षेत्रों में...जैसे की कारोबार,रिश्तों या परिवार या जीवन से जुडी़ दीगर स्वार्थ से संबधित बातों मे मनुष्य रखता है.प्र्कृति, पर्यावरण और परिवेश जैसे परिवार का हिस्सा हुआ करता था.इधर कुछ बरसों में स्थितियां कुछ विपरीत हो गईं हैं.अब पानी,प्रकृति,निसर्ग,पर्यावरण के लिये अलग से चिंता करने की ज़रूरत आन पडी़ है.ऐसा क्यों हुआ यह सोचने पर समझ में आ जाता है कि हम प्रकृति का दोहन करने के मामले में इतने बेरहम हो गये कि हमें अंदाज़ ही नहीं रहा कि हम कितनी विपरीत परिस्थितियों को आमंत्रित कर रहे हैं दूसरों को दोष देने में तो हम हमेशा से माहिर ही रहे हैं.पानी की किल्लत के लिये या अल्पवर्षा के लिये भी हम प्रकृति के मत्थे मढ रहे हैं सारा दोष.हां हमारी फ़ितरत देखिये कि जिन चीज़ों के लिये हमें क़ीमत चुकानी पड़ती है उसमें तो हम पूरी सतर्कता बरतते हैं लेकिन मुफ़्त के माल यानी जैसे कि पानी के मामले में हम पूरी बेपरहवाही से काम लेते हैं.इस सव को स्वीकारने में कैसी शर्म कि पर्यावरण हमारी प्राथमिकता सूचि में है ही नहीं.बस यहीं से सारी समस्या की शुरूआत होती है.हम बेसुध होकर पेड़ काटते जा रहे हैं.प्रदूषण के मामले में हम अभी भी गंभीर नहीं हुए हैं.दूरदर्शन के डी.डी.न्यूज़ को देखकर अच्छा लगा कि उसने अपने समाचार में खेल,कारोबार,मौसम के साथ अब पर्यावरण को लेकर रोज़ विशेष समय देना प्रारंभ कर दिया है.चैनलों से प्रसारित छिछोरी ख़बरों के बीच पर्यावरण को खा़स जगह मिलना सुखद है.होना तो यह भी चाहिये कि विद्यालयीन स्तर पर प्रत्येक कक्षा में एक पाठ (हिन्दी/अंग्रेज़ी दोनो माध्यमों में)पर्यावरण या खा़सतौर पर पानी की बचत पर होना ही चाहिये.प्रतिदिन ख़बरें आ रहीं हैं कि गंगा या नर्मदा जैसी नदियों का जल स्तर घटता जा रहा है.यानी ख़तरे की घंटी तो बज ही चुकी है और हमें मानसिक रूप से इसके लिये तैयार भी रहना चाहिये क्योंकि ये सब हमारा ही किया कराया है.बरसात की आमद होने ही वाली है और दिखियेगा कि एक बार हम फ़िर बेफ़िक्री से बरसात का मज़ा लेते रहेंगे और॥अच्छे मानसून की खुशिया मनात,मल्हार गाते भूल जाएंगे कि जल की बचत होनी ही चाहिये.वाटर री-चार्जिंग यानी जल-पुर्नभरण समय की मांग है और इसके लिये जन-सामान्य में जागरूकता बेहद ज़रूरी है...ग्रामीण और शहरी दोनो क्षेत्रों में.पानी को लेकर विश्व-युध्द होंगे ऐसी हमारे पर्यावरणविदों के वक्तव्य भी हमें भयभीत नहीं करते.भगवान करे ऐसा ना ही हो लेकिन इतना तय है कि युध्द से बडा़ खतरा मनुष्य का पानी के लिये बेभान हो जाना है.इस ओर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो ध्यान रखिये पानी को लेकर आतंकवाद या आरक्षण से ज़्याद भीषण स्थितियां बन सकती हैं . पानी पर चर्चा करने से बेहतर है कि पानी के फ़िजूल खर्चा पर हो .

मज़ाक की बात नहीं है पर देखियेगा कि ऐसा भी समय आ सकता है कि बेटे का बाप लड़की का हाथ मांगते वक़्त अपने होने वाले समधी से कहे कि भाई साहब दहेज़ - वहेज़ तो रहने दीजिये॥आप तो इतना बता दीजिये कि यदि यह संबंध होने के बाद हमारे घर में पानी की किल्ल्त हुई तो आप पानी का टेंकर भेज पाएंगे न..यदि हां तो रिश्ता पक्का समझिये.....

अब कहने से कुछ नहीं होगा...पानी बचाना ही होगा...
वरना हमें शायद पानी के संदर्भ में ये कहते हुए लोग मिल जाएं....


अब तो उतनी भी नहीं मिलती है ज़माने मे
जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में.


- संजय पटेल

Thursday, April 24, 2008

क्या कुछ भी तुम्हे अब आमंत्रित नहीं करते ?

यदि बन सको तो बनो
पर्वतों की भाँति औघड़
नदियों की भाँति पारदर्शी
और आदिम हवाओं की भाँति अनागरिक
धरती के काव्य-संकलन जैसे
ये वन,उपवन,पर्वत
साम्राग्यियों के चीनांशुकों से
ये धनखेत
कृष्ण-आकुल गोपिका नेत्रों जैसे
ये श्यामल मेघ
क्या कुछ भी तुम्हें अब आमंत्रित नहीं करते ?


-श्रीनरेश मेहता

Wednesday, April 23, 2008

खई के पान बनारसवाला ...बनारस मैं पैदा नही होता !

बनारस और पान का अटूट बन्धन है, सदियों से यही बताया जाता रहा है , मगर सिर्फ़ किस्से-कहानियों में, फिल्मी गीतों के मुखड़ों में। हकीक़त कुछ और ही है। शायद आप जानते न हों मगर मैं तो जानता हूँ .दरअसल पूरी दुनिया में अपनी धाक जमाने वाला बनारसी पान बनारस में पैदा ही नहीं होता; वहाँ की आबोहवा पान की खेती के लिए
मुफीद नहीं है। वहाँ तो केवल पान का रंग-रोगन किया जाता है। यह पान आता है बिहार राज्य के गया जिले से जहाँ इसके सैकड़ों बरेजे हैं.बरेजा मतलब पनवाडी या यूँ कहें की पनवाड़ी जिसमें पान की खेती होती है। यह पान हरे रंग का साधारण सा दिखने वाला पत्ता होता है और उसे भेजा जाता है बनारस की पान मंडी में जहाँ इसे गरम पत्थरों की भट्टी में तपाकर सफ़ेद और नरम बनाया जाता है। लीजिये तैयार हो गया बनारस का मशहूर पान , अब दबाइये इसका भीड़ा मुँह में और याद कीजिये गया को । एक बात और....पान चाहे आप बनारसी खाएँ अथवा मीठा कलकत्ता या कड़क मद्रासी , इसकी पीक इधर-उधर न थूकिये, दाग़ आपके कपड़ों के साथ ही पर्यावरण पर पड़ेंगे जो न केवल अशोभनीय है वरन प्रदूषण भी फ़ैलाते हैं। दो ध्यान रहे .......यत्र - तत्र धूकना मना है।

-प्रणय रावत

गुरुदेव रचित गीत देश की माटी .....देश का जल

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर रचित गीत देश की माटी ,देश का जल हिन्दी में विख्यात कवि पंडित भवानीप्रसाद प्रसाद मिश्र द्वारा अनुदित है .......

देश की माटी देश का जल
हवा देश की देश के फल
सरस बनें प्रभु सरस बने
देश के घर और देश के घाट
देश के वन और देश के बाट
सरल बनें प्रभु सरल प्रभु
देश के तन और देश के मन
देश के घर के भाई -बहन
विमल बनें प्रभु विमल बनें